शराबी मैं हुआ मेरी मर्ज़ी थी ,मरना सबको है सब दिन एक दिन
मैं बदनाम यूँ भी नई बेकार , कुछ तो बदनामी कराती होगी जो कराती है बदनाम
इज़्ज़त को इज़्ज़त मैं भी मान चूका था , वो आया और पर्दा उठा दिया
अपने को अपना मैं भी समझता था , खुदा आया और आईना दिखा दिया
शायरी होती नहीं अच्छी मुझजसे बिना नशे के , नशे करूँ तो बुरा हूँ मैं
इंसानियत को मोहबत मुझसे भी है , दिक्कत यूँ है की ज़िंदा हूँ मैं
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