बरक़तें उनकी देख के यूँ लगा के, आसमान देख के थुुकते हैं दौलत वाले
पी शराब तो ये जाना के दोस्त को दोस्त कहने वाले भी दुश्मन हैं
शायर ये बताने वाला भी गलत हैं अपनी जगह, के दोस्त दोस्त है और दुश्मन दुश्मन है
इतना इश्क़ किया दोस्तों से मैंने , के अब दिल टूटता है तो भी शिक़वा करना का जी नहीं करता
ना उनसे मिलना अगर इश्क़ से रोकता है तुमको , हल्का रह गया कुछ रंग तुम्हारे इश्क़ का
इश्क़ से क्या डरना , इश्क़ तो हमने भी किया , करो ऐसा के मिला ना भी तो दिल से दुआ निकले
गाली देती है दुनिया बेवफाओं को , मैं फिर वैसा होता तो गली देता
काश मेरा इश्क़ भी झूठा होता , हँसता तेरी ज़ात पे और गली देता
बस यूँ ही बेहला लेता हूँ दिल को, के सूफी होता तो अच्छा होता
जाना अब यूँ उम्र दराज़ होक , करा जिसने जो भी बेकार करा
टुटा फरेब मेरा भी उनका भी, इश्क़ मैंने किया , दिल्लगी उनकी थी
दुआ मेरी भी है रब से एक , के दोस्ती दोस्त को दोस्त की तरह देखे
यूँ तो गिला है के दोस्ती निभाई नहीं तुमने , गुमान इसका है के शायरी अच्छे हो गयी
नशे यूँ हुए के पता न लगा किस्से क्या कहा , बुरा बोहोत लगा पर पता न लगा उसे क्या कहा
खुदगर्ज़ इतना भी नहीं के माफ़ी न मांग सकूँ ... काश मुझे पता चले ऐसा उसे मैंने क्या कहा
क्या लगता है तुमको के रिश्ते यूँ होते गर सिक्के सिक्के न होते ?
दर्दे-इ-जूदयी से यूँ हो गयी मोहबत हमको , के अब मिलने से दर लगता है
यूँ तो मैंने भी दोस्त बनाना चाहता था ज़माने को ...कुछ मेरे न हो सके कुछ का मैं न हो सका
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