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Showing posts from April, 2024

गर्दिश के दिन

बरक़तें उनकी देख के यूँ लगा के, आसमान देख के थुुकते हैं दौलत वाले पी शराब तो ये जाना के दोस्त को दोस्त कहने वाले भी दुश्मन हैं  शायर ये बताने वाला भी गलत हैं अपनी जगह, के दोस्त दोस्त है और दुश्मन दुश्मन है इतना इश्क़ किया दोस्तों से मैंने , के अब दिल टूटता है तो भी शिक़वा करना का जी नहीं करता ना  उनसे  मिलना  अगर  इश्क़  से  रोकता  है  तुमको  , हल्का  रह  गया  कुछ  रंग  तुम्हारे  इश्क़  का  इश्क़  से  क्या  डरना , इश्क़  तो  हमने  भी  किया , करो  ऐसा  के  मिला  ना   भी  तो  दिल  से  दुआ  निकले  गाली  देती  है  दुनिया  बेवफाओं  को  , मैं  फिर  वैसा  होता  तो  गली  देता काश  मेरा  इश्क़  भी  झूठा  होता  , हँसता  तेरी  ज़ात  पे  और  गली  देता बस  यूँ  ही  बेहला  लेता  हूँ...