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ज़ख्म

ख़ुद के ज़ख्मों को कुरेदते रहे 
के ख़ुशी मिलती थी उन्हें मुझे चीखता देखकर।

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गर्दिश के दिन

बरक़तें उनकी देख के यूँ लगा के, आसमान देख के थुुकते हैं दौलत वाले पी शराब तो ये जाना के दोस्त को दोस्त कहने वाले भी दुश्मन हैं  शायर ये बताने वाला भी गलत हैं अपनी जगह, के दोस्त दोस्त है और दुश्मन दुश्मन है इतना इश्क़ किया दोस्तों से मैंने , के अब दिल टूटता है तो भी शिक़वा करना का जी नहीं करता ना  उनसे  मिलना  अगर  इश्क़  से  रोकता  है  तुमको  , हल्का  रह  गया  कुछ  रंग  तुम्हारे  इश्क़  का  इश्क़  से  क्या  डरना , इश्क़  तो  हमने  भी  किया , करो  ऐसा  के  मिला  ना   भी  तो  दिल  से  दुआ  निकले  गाली  देती  है  दुनिया  बेवफाओं  को  , मैं  फिर  वैसा  होता  तो  गली  देता काश  मेरा  इश्क़  भी  झूठा  होता  , हँसता  तेरी  ज़ात  पे  और  गली  देता बस  यूँ  ही  बेहला  लेता  हूँ...

ज़िन्दगी की तलाश

यूँ जो तलाश तुमको ज़िन्दगी की है तलाश ये बेकार शुरू से रही तुम्हारी व्यर्थ है लिखना उन फकीरों का भी यूँ के जी न सकोगे उनकी ज़िन्दगी भी तुम करते रहो जुगत इस तमाशे से जुड़ने की ज़िन्दगी को ज़िन्दगी भर ढूंढते रहोगे तुम कहना कुछ तो है बेकार मेरा भी पर सोचोगे तो सोचते रहोगे तुम